Paryavaran Parivartan Sanrakshan, In Hindi

Paryavaran Parivartan Sanrakshan - प्रकृति ने पर्यावरण का निर्माण अजैव और  जैव घटको से किया है। जैव घटको में मानव सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व  है जो अपने क्रिया कलापो से पर्यावरण को सर्वाधिक प्रभावित करता है। वह पर्यावरण का नियंत्रक, संचालक, रूपान्तरक और विनाशक है इन क्रियाओ को रूप  देने में वह स्वयं  दुवरा बदलता रहता है। अपनी छमता, आवशयकता और समजन भावना के दुवरा वह अपने परिवेश की व्यवस्था अर्थात पारिस्थितिकी का नियमन करता है।

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Paryavaran Parivartan Sanrakshan - Environment

Environment And Ecology 
अतः स्पष्ट  पर्यावरण और पारिस्थितिकी Environment and Ecology की कार्य प्रणाली प्रकृति  स्वनियमन व्यवस्था दुवरा संचालित होती है। पर्यावरण तत्व पर्यावरण तत्व पारिस्थितिकी  नियंत्रण कर जीवन विकास के लिए आवशयक परिस्थितियों का निर्माण है। यह व्यवस्था तब तक चलती रहती है जब तक पर्यावरण  संतुलन बना रहता है। अर्थात पर्यावरण  अपने गुण के अनुशार आपस में तथा जैविक घटक के साथ परस्पर क्रिया करते है। लेकिन जब भौतिक  मानवीय कारणों से पर्यावरण के किसी तत्व को छति पहुँचती है। तो पहले वः स्वनियमन व्यवस्था  अंतर्गत संतुलित प्रयास करता है। लेकिन जब उसकी सहन सिमा से अधिक आघात  प्रभाव होता है  उसका संतुलन बिगड़ने लगता है। कभी - कभी भौतिक कारणों से भी ऐसी स्थिति बनजाति है।  लगातार जब पर्यावरण के तत्वों की अवमानना होने लगती है तो पर्यावरण में परिवर्तन  लगता है, जो की पारिस्थितिकी  संतुलन बिगाड़ देता है, क्योकि पारिस्थितिकी पर्यावरण के सहयोग से कार्य करती है। पर्यावरण के हास से जीवन की गुणवंता घटने लगती है तो विकास की सारी प्रक्रिया उल्टा दिशा   मुड़ने लगी है,  जो अवनीति का मार्ग प्रशस्त करती है।

Environmental Changes 
अपनी उन्नति को सतत बनाये रखने के लिए आदिकाल से आदुनिक काल तक मानव समाज ने विविध प्रयोग किये है। मिलभुत आवशयकताओ की पूर्ति के लिए भौतिक संसाधनों का इस क्रम में पर्यावरण के प्रति किये गए अमैत्रीपुंन कार्य यथा प्रदूषण,  वन विनाश,अधिक जनभार,संशाधनो का अनुचित दोहन आदि स्वनियमजन्य छमता से अधिक हो जाता है। तो उसके फल स्वरूप पर्यावरण के तत्व पंगु होने लगते है। इसका सीधा प्रभाव पारिस्थितिकी पर पड़ता है। पारिस्थितिकी के असंतुलन से परियावां के हास का आभास होता है। स्पस्ट है की पर्यावरण के हास्  के लिए मानव सबसे बड़ा कारक है। उदाहरण के लिए वनो की अंधाधुन कटाई, आद्योगिक विकास, नगरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण प्रदुषण घातक अवस्था तक पहुंच गया है। प्रदुषण से पर्यावरण के अनेक तत्व,वायु,जल, मृदा आदि स्वाभिक गुण खोते जा रहे है। वनस्पति विनास से जलवायु और मौसम का रुख बदल रहा है। भूमिछरन  और बाढ़ का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।

Human knowledge
विज्ञानं और तकनिकी विकास पर आधारित रहा है। जब तक प्रकृति के सहयोग से मानव अपनी आवशयकताओ की आपूर्ति करता रहा है तब तक पर्यावरण और पारिस्तितिकी  संतुलित  रही है। लेकिन वर्तमान बढ़ती जनसंख्या बढ़ता भोतिकवाद, उच्च तकनिकी और प्रकृति के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार के कारण भौतिक प्रगति की गति को इतना तीव्र बना दिया है। की उसका कुप्रभाव पड़ने लगा है। संशाधन दोहन अतियाधिक ऊर्जा प्रयोग, अधियोगिककरण, शहरीकरण, सौर मंडलीय क्रिया कलाप और प्रकृति के प्रति बढ़ती उपेछा ने पर्यावरण परिवर्तन की एक ऐसी टिकट परिस्थिति पैदा कर दी है की इसके सम्बन्ध में आज सोचना आवशयक है।

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